देश का इकलौता मंदिर जिसका दरवाजा पूरब नहीं पश्चिम की ओर खुलता है, कहते हैं कि एक रात में ही हुआ था इसका निर्माण
सूर्य देव मंदिर की स्थापना
औरंगाबाद जिले का प्राचीन अनोखा इसलिए भी है क्योंकि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने एक रात में किया था। यह देश का एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर है । इस मंदिर में सूर्य देवता की मूर्ति सात रथो पर सवार है । एक बार औरंगजेब काला पहाड़ मूर्तियो एंव मंदिरो को तोड़ता हुआ यहां पहुंचा तो देव मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की, कि इस मंदिर को ना तोडें क्योकि यहां का भगवान का बहुत बड़ा महत्व है। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच तुम्हारे भगवान में शक्ति है तो मै रातभर का समय देता हूं यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाए तो मै नहीं तोरूंगा । पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रातभर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सुबेरे उठते ही हर किसी ने देखा की सचमुच मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था, और तब से मंदिर का द्वार पश्चिम की ओर ही है।
सूर्य मंदिर से जुड़े अन्य प्राचीन काथाएं
हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते है। भगवान भास्कर का यह त्रेतायुगीन मंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित मनोंकामना पूर्ण करने वाला पवित्र धर्मस्थल माना जाता है
मंदिर से जुड़े अन्य दूर्लभ लोककाथाएं
एक बार भगवान शिव के भक्त माली और सोमाली सूर्यलोक जा रहें थे। यह बात सूर्य को रास नहीं आयी। उन्होनें दोनों शिवभक्तो को जलाना शुरू कर दिया। अपनी अवस्था खराब होते देख माली और सोमाली ने भगवान शिव से बचाने की अपील की । फिर, शिव ने सूर्य को मार गिराया । सूर्य तीन टुकड़ो में पृथ्वी पर गिरे। कहते है कि जहां-जहां सूर्य के टुकड़े गिरे, उन्हे देंवार्क सूर्य मंदिर बिहार के पास, लोलार्क सूर्य मंदिर काशी के पास, कोणार्क सूर्य मंदिर कोणार्क के पास के नाम से जाना जाता था। यहां तीन सूर्य मंदिर बनें। देंव का सूर्य मंदिर उन्ही में से एक है।
आखिर कैसे पड़ा इस स्थान का नाम देव ?
मंदिर निर्माण के कुछ वर्ष बाद ही एक घटना घटी की जब देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूप में आदित्य भगवान हुए, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाया। कहते है उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया।

